एक समय बाद न शौक रहेगा, खुद को साबित करने का,
न जूनून बचेगा, जबरदस्ती अधिकार जताने का।
न चाह रहेगी, हर मोड़ पर समर्पण दिखाने की,
क्योंकि तब समझ आएगी, रीत निभाने की।
परिपक्वता सिखा देगी, प्रेम क्या है,
बांधना नहीं किसी को, छोड़ देना ही सच्चा है।
जकड़ना नहीं प्रेम है, मुक्त कर देना है,
उसकी उड़ान के लिए, आकाश दे देना है।
हर शिकायत को, मुस्कान में समेट लेंगे,
अश्रु भी होंगे तो, हँसी में लपेट लेंगे।
'ठीक है' कह कर, उसकी खुशी चुन लेंगे,
खुद के दर्द को भी, चुपचाप सुन लेंगे।
ये हार नहीं है, ये ही तो जीत है,
यही प्रेम की, सबसे पवित्र रीत है।
जहाँ मैं नहीं, बस तू ही तू रहता है,
जहाँ अधिकार नहीं, सम्मान बहता है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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