कदंब वंश की बेटी, नायिका देवी नाम,
अजयपाल संग ब्याह रचाया, पाया सोलंकी धाम।
पति परलोक सिधारे, पुत्र छोटा मूलराज,
राजमाता बन संभाला, सारा गुजरात राज।
उधर गजनी से निकला, गोरी अभिमानी,
सोचा बालक राजा है, विधवा रानी।
रेगिस्तान लांघ कर, गुजरात को आएगा,
सोने की धरती को, सहज ही पाएगा।
पर वह न जानता था, किससे है टक्कर,
सिंहासन पर बैठी है, खुद दुर्गा बनकर।
नायिका ने सोचा, खुले में न लड़ेंगे,
घोड़े उसके तेज हैं, हम कैसे अड़ेंगे।
बुद्धि से रचा व्यूह, आबू को चुना,
कसारदा का घाट, संकरा है घना।
पहाड़ों के बीच जहाँ, घोड़े फँस जाएं,
हाथी और पैदल ही, वहाँ लड़ पाएं।
बजा युद्ध का नगाड़ा, रणचण्डी आई,
बालक मूलराज संग, सेना लहराई।
जय सोमनाथ का नारा, गूंजा घाटी में,
टूट पड़ी सेना, गोरी की छाती में।
हाथियों ने रौंदा, तलवारें चमकीं,
गोरी की घुड़सवारी, धरी की धरी रह गई।
लहू से रंग गई, आबू की घाटी,
गर्व से भरी गोरी की, टूट गई छाती।
भागा वह गजनी को, जान बचा कर,
फिर कभी न आया, गुजरात पुकार कर।
एक विधवा रानी ने, ऐसा पाठ पढ़ाया,
आक्रांता भी जिसको, सदा याद आया।
इतिहास ने लिखा, पर भूला दिया गया,
पाठों में जिसको, कम बताया गया।
पर सच है अमर, कसारदा साक्षी है,
नायिका देवी भारत की, वीर-प्रतिमूर्ति है।
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