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नाम का दीप जला दो

                
                                                         
                            "नाम का दीप जला दो"
                                                                 
                            

परमात्मा, तुमने जीवन दिया, अन्न दिया,
जल दिया, वायु दी, अग्नि का वरदान दिया।
औषधि दी, वनस्पति दी, धरा सजाई,
धन दिया, वैभव दिया, सम्पत्ति बरसाई।

सुख दिया, साधन दिए, वैभव अपार दिया,
इन सबसे ऊपर तुमने, चेतन विचार दिया।
चेत दिया, चेतन दिया, चेतना दी,
शुक्राना प्रभु! शुक्राना! कृपा इतनी दी।

अब और कुछ नहीं, चाहिए हमें,
बस एक ही विनती, सुनो तो जरा हमें।
सृष्टि का अमूल्य वैभव, नाम तुम्हारा,
हमारी झोली में डाल दो, सहारा तुम्हारा।

अंतर्मन के कोने में, अंधेरा घना है,
वहाँ अपने नाम का, एक दीप जला दो।
ऐसा दीप जले, जो कभी न बुझे,
जिसके आलोक से, रोम-रोम सजे।

रोम-रोम तेजोमय, हो जाए सारा,
कण-कण में गूँजे, नाम ही तुम्हारा।
रोम-रोम पी ले, परमानंद का रस,
मिट जाए जीवन का, सारा ही कस।

नाम तेरा ही आधार, नाम ही सार है,
नाम बिना ये जीवन, बेकार है।
ॐ रसो वै सः, तू ही रस अपार है,
रस को पा कर ही, जीव आनंदित होता है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

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