जंगल में रहता था, एक रत्नाकर नाम,
लूट-पाट ही जिसका, बन गया था काम।
राहगीरों को लूटता, करता था अधर्म,
परिवार के लिए ही, कहता था ये कर्म।
एक दिन उस वन से, नारद मुनि आए,
रत्नाकर ने रोका, उन्हें भी डराए।
पर नारद न डरे, मुस्कुराए शांत,
बोले - किसके लिए करता है ये भ्रांत?
पूछा - जो पाप तू, परिवार हेतु करता,
क्या परिवार तेरा, आधा पाप धरता?
बाँधा नारद को, घर को दौड़ा धाए,
पत्नी, पिता, माता से, वही प्रश्न लाए।
सबने कहा - हम तो, रोटी के साथी हैं,
तेरे पाप-पुण्य के, हम न भागीदार हैं।
सुनकर ये उत्तर, टूटा अहंकार,
आँखों से बह निकला, पश्चाताप अपार।
लौटा नारद चरणों में, गिरा और रोया,
क्षमा करो मुनिवर, मैंने पाप में खोया।
नारद बोले - बेटा, अब राम नाम जप ले,
इसी नाम से जीवन का, अंधकार हर ले।
पापों से जिह्वा पर, राम न आए,
तो मरा-मरा जप ले, राम बन जाए।
जपता रहा मरा-मरा, युग बीत गए,
मरा-मरा जपते-जपते, राम गीत भए।
ऐसी लगी समाधि, हिला न तन-मन,
दीमकों ने बना दिया, मिट्टी का वाल्मीक तन।
तप से पिघला तमस, जन्मा नया प्रकाश,
डाकू रत्नाकर ही, बना वाल्मीकि महाकाव्य आकाश।
सीख यही है - पाप का भागी कोई नहीं,
अपने कर्मों का लेखा, तुझे ही भरना वहीं।
पर यदि सच्चे मन से, राम शरण आए,
डाकू भी महर्षि बन, रामायण रच जाए।
- जगदीश प्रसाद शर्मा, दिल्ली
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