"बाण-शय्या पर अंतिम संवाद"
कुरुक्षेत्र रण थम गया, मौन हुई तलवार,
बाणों की शय्या पर लेटे, भीष्म देव-स्वरूप अपार।
उत्तरायण की राह तकते, गिनते अंतिम श्वास,
तभी आ पहुँचे द्वारका-नाथ, लिए पांडवों को साथ।।
भीष्म ने देखा कृष्ण को, भूल गए सब पीर,
आँखों में आँसू भर आए, झुक गया धीर-गंभीर।
हाथ जोड़कर बोले पितामह, हे योगेश्वर महान,
शंख-चक्र-गदा-धारी, तुम्हें कोटि प्रणाम।।
हे सर्वशक्तिमान कृष्ण, अब आज्ञा दीजिए,
इस नश्वर काया से मुझको, मुक्त कीजिए।
जीवन भर व्रत पाला, पर एक भूल हुई भारी,
धर्म जानते हुए भी, मौन रहा दरबारी।।
द्रौपदी के चीर-हरण पर, जब मैं मौन रहा,
धर्म नहीं, देह के बंधन को, तब मैंने गहा।
उसी मौन का दंड आज, बाणों में पाया है,
पर अंत समय तुम आए, तो जीवन धन्य हो गया है।।
कहा था दुर्योधन से, सुन मूढ़ अज्ञानी,
जहाँ कृष्ण हैं वहीं धर्म है, वहीं विजय कल्याणी।
आज वही वचन देखो, सत्य होकर आया,
धर्म-राज्य स्थापित हुआ, कृष्ण ने धर्म निभाया।।
हे माधव, मेरे पांडव, तेरे भक्त अनन्य,
इनकी रक्षा करना, तुम ही हो धन्य-धन्य।
मैंने जो ज्ञान संजोया, युगों-युगों का सार,
युधिष्ठिर को दे जाऊँ, यही अंतिम उपहार।।
तब मुस्कुराए वासुदेव, बोले वाणी गंभीर,
हे कुरुवंश के गौरव, हे धीर-वीर-धीर।
तुम सा ज्ञानी, त्यागी, न कोई दूसरा हुआ,
इच्छा-मृत्यु का वर पाकर भी, धर्म न तज सका।।
तुम्हारा मौन भी देखो, एक नीति सिखाता है,
प्राण जाए पर वचन न जाए, यही धर्म कहाता है।
तुमने जो राज-धर्म कहा, मोक्ष-धर्म बताया,
वही युगों तक जग को, राह दिखाता जाएगा।।
फिर भीष्म ने सब इन्द्रियाँ, कृष्ण में लीन कीं,
मन-प्राण समर्पित करके, आँखें बंद कीं।
एक ज्योति निकली तन से, कृष्ण में समाई,
तब बाण-शय्या पर ही उनको, मुक्ति मिल गई।।
--- जगदीश प्रसाद शर्मा
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