देह रहते जो साध ले, मन के वेग अपार,
कामना क्रोध की लहर, न कर पाएं वार॥
वही योगी सच्चा है, वही जीवन में सार,
भीतर की जंग जीते, बाहर सब बेकार॥
क्रोध का आना नहीं, सदा हमारे हाथ,
पर क्रोध में क्या करें, ये है अपने साथ॥
तुरत दिया उत्तर जो, कड़वे निकले बोल,
बाद में पछतावा ही, खोलता उसके पोल॥
जिस पल थाम लिया खुद, उफनते सागर को,
उसी पल जीत लिया, जग के हर डगर को॥
शब्द की धार से, रिश्ते बिखर जाते,
मौन की मरहम से, घाव सभी भर जाते॥
वेग सहन की कला, सबसे बड़ी साधना,
मन जीता जग जीता, यही गीता की वंदना॥
क्रोध रुका जिस क्षण, शांति ने घर किया,
आत्म-विजय से ही, जीवन सार्थक हुआ॥
- जगदीश प्रसाद शर्मा, दिल्ली
स्वरचित मौलिक रचना
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