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आईना...

                
                                                         
                            1. समाज का आईना: "वृद्धाश्रम"
                                                                 
                            

जिन हाथों ने झूला झुलाया,
आज वो हाथ काँपते हैं।
जिन दीवारों को ईंट-ईंट जोड़ा,
आज वो दीवारें याद आती हैं।

बेटा कहता है "व्यस्त हूँ",
बहू कहती है "जगह नहीं"।
और माँ-बाप एक कमरे में,
अपनी पूरी उम्र लिए बैठे हैं।

आईना दिखाता है,
घर बड़ा हो गया,
और दिल छोटे।

2. मन का आईना: "तुलना"

पड़ोसी की थाली में घी ज्यादा,
अपनी रोटी फीकी लगने लगी।
दोस्त की गाड़ी नई,
अपना घर पुराना लगने लगा।

तुलना की कैंची से,
खुशी के कपड़े काट दिए।
जो था वो भी बुरा लगा,
जो नहीं था उसकी चाहत बढ़ गई।

आईना पूछता है,
तेरी जिंदगी बुरी थी,
या तूने उसे बुरा मान लिया?

3. जीवन का आईना: "क्रोध"

1 मिनट का क्रोध,
10 साल का रिश्ता जला देता है।
1 गलत शब्द,
100 सही बातें मिटा देता है।

क्रोध आए तो पानी पियो,
न आए तो भी पियो।
क्योंकि प्यास बुझती है,
और आग भी।

आईना कहता है,
मुट्ठी बंद करने से पहले,
सोच लो... क्या खो रहा है?

4. प्रकृति का आईना: "पेड़"

हमने कंक्रीट के जंगल बना लिए,
और असली जंगल काट दिए।
AC लगाया, पेड़ काटे,
फिर सांस के लिए सिलेंडर खोजे।

पेड़ खड़ा था तो छाया देता था,
फल देता था, ऑक्सीजन देता था।
हमने उसे फर्नीचर बना दिया,
अब हम सांस का फर्नीचर खोज रहे हैं।

आईना बताता है,
पेड़ नहीं कट रहे,
हमारी सांसें कट रही हैं।

- जगदीश प्रसाद शर्मा, दिल्ली
(मौलिक रचना)
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2 घंटे पहले

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