चलो तुम्हें पहाड़ घुमा के लाएँ,
भाग्य और भगवान की बात बताएँ।
पगडंडी-पगडंडी कैसे चलना है?
पत्थर-पत्थर जीवन कैसे ढलना है?
जब से धरती पर मानव आया,
एक सवाल सदा दोहराया।
क्यों ऐसा है जग का जीवन?
क्यों इतना विचलित रहता मन?
किसने लिखी जीवन की रेखा?
भाग्य को आखिर किसने देखा?
क्या नियति है, कर्म हमारा?
कौन है जीवन का रखवाला?
चलो दिखाएँ पहाड़ के धारे,
निर्मल जल के नौले पुराने।
कमल में, ब्रह्मकमल खिले,
प्यौली, बुरांस मुकम्मल खिले।
देवभूमि की पावन धरती,
कण-कण में आस्था भरती।
देवालय में घंटी बजती,
धूप देवदारों में सजती।
चलो सवाल फिर दोहराते हैं,
खामोशी से, पूछ के आते हैं।
देवों से क्यों प्रश्न किया?
कर्मों से क्यों मर्म लिया?
पत्थर काट के खेत बनाए,
माटी सूखी - बीज उगाए।
बादल बरसे या धूप सताए,
हलिया फिर भी हल चलाए।
हरेला जब आँगन आता,
हरियाली का संदेश सुनाता।
सात अनाज के अंकुर कहते,
आज बोओगे, कल फलेंगे।
धरती माँ का मान बढ़ाना,
अपनी जड़ों को भूल न जाना।
जागर की जब धूनी जलती,
पुरखों की आवाज़ें मिलतीं।
ढोल-दमाऊँ की थाप सुनाती,
माटी अपना राग सुनाती।
छोलिया की तलवारें देखो,
वीरों की हुंकारें देखो।
पर्वत ने डरना कब जाना,
डगर कठिन हो, बढ़ते जाना।
चट्टानों से राह बनाना,
गिरकर फिर से उठते जाना।
यही पहाड़ की रीति पुरानी,
संघर्षों की अमर कहानी।
आमा-बुबू का मान बढ़ाना,
बाखुली की शान बचाना।
कर्म तुम्हारे, सेठ-धन्ना लिख दे,
भाग्य अगर कोई पन्ना लिख दें।
पित्तर-आबदेव का मान बढ़ाएँ,
कुमाऊँ की शान, सदा बचाएँ।
तल्लाघर - मल्लाघर, ये बताना,
पीढ़ी - पीढ़ी ये समझाना-
देबों पर विश्वास हमारा,
कर्मों पर अधिकार हमारा।
-जगदीश चंद्र कापड़ी
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