नौ बरस की संतोषी,
आठ बरस का प्रेम,
नन्हे-नन्हे दो बाल-मन,
न कोई छल, न नेम।
“संतोषी री!” आवाज़ लगाकर,
प्रेम खड़ा था द्वार,
संतोषी दौड़ी बाहर आई,
चेहरे पर मुस्कान अपार।
प्रेम ने पूछा— “संतोषी,
मुझसे प्यार करोगी?”
हँसकर बोली नौ बरस की—
“हाँ! क्यों नहीं करूँगी?”
प्रेम बोला— “तो आज तुम्हारे
घर मैं मिलने आऊँगा,
तुम मुझे बस देख लेना,
चुपके से लौट जाऊँगा।”
पथरीली राहें, खड़ी चढ़ाई,
कहीं धूप तो कहीं छाँव,
कभी सँभलकर, कभी फिसलकर,
प्रेम बढ़ाता अपने पाँव।
कंधे पर छोटा-सा बस्ता,
आँखों में मीठी आस,
आठ बरस का नन्हा प्रेम
चलता संतोषी के पास।
आँगन में उसने चक्कर काटे,
थककर लौट गया प्रेम,
नन्हे मन की नन्ही चाहत,
लेकिन भाव असीम।
अगले दिन विद्यालय में पूछा—
“कल बुलाया क्यों नहीं?”
संतोषी बोली— “भूल गई थी,
तुम्हें देखा भी तो नहीं!”
प्रेम बोला— “आज बुलाना,
मैं फिर घर आऊँगा।”
ढलते सूरज के संग-संग,
फिर तेरे घर आऊँगा।
पर संतोषी खेल में मग्न थी,
प्रेम खड़ा था दूर,
आठ बरस के उस मन में
स्नेह रहा भरपूर।
अगले दिन विद्यालय न जाकर
शाम को घर जा पहुँचा,
पहाड़ों की उन पगडंडियों से
चलकर उसके घर जा पहुँचा।
बोला— “चाचाजी! संतोषी मेरे
साथ पढ़ती है,
मैं इसके साथ खेलूँ?
ये मुझसे कभी नहीं लड़ती है।”
न कोई चालाकी थी मन में,
न कोई व्यापार,
दो नन्हे बच्चों के मन में
बस था निश्छल प्यार।
संतोषी ने हाथ बढ़ाया,
प्रेम ने थामा हाथ—
न कोई शर्त, न कोई मतलब,
बस बचपन का साथ।
न कोई स्वार्थ, न कोई छल,
न दुनिया का ज्ञान अपार,
बचपन के राधा-कृष्ण-सा
पावन था यह प्यार!
आठ बरस के प्रेम को,
नौ बरस से रहता हर काम,
उस बचपन के निश्छल मन को,
सौ-सौ बार प्रणाम!
-जगदीश चंद्र कापड़ी
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