चौदह सितंबर का दिवस सुहाना,
हिंदी ने पाया गौरव-तराना।
वर्ष उन्नीस सौ उनचास का था वह क्षण महान,
संविधान सभा ने दिया हिंदी को राजभाषा का सम्मान।
देवनागरी की लिपि सुसज्जित, सरल-सुगम अभिव्यक्ति,
जन-जन के अधरों पर इसकी मधुरिम अनुरक्ति।
संस्कृत की सुरभि लिए, लोक-धरा का मान,
हिंदी में स्पंदित होता भारत का प्राण।
नहीं केवल भाषा है यह, संस्कृति की पहचान,
इतिहास, परंपरा, लोकजीवन का करती गुणगान।
कबीर की निर्भीक वाणी, तुलसी का विश्वास,
सूर की वात्सल्य-धारा, मीरा का मधुर प्रकाश।
प्रेमचंद के पात्रों में जनजीवन की पीर,
दिनकर के ओज में गूँजी स्वाधीनता की वीर।
महादेवी की करुणा बनकर आँसू-सी बहती,
निराला की चेतना बन रूढ़ि-बंधन सहती।
यह भाषा नहीं विभाजन, यह तो सेतु महान,
उत्तर से दक्षिण तक करती एकत्व का गान।
पूर्व-पश्चिम की दूरियाँ करती क्षण में क्षीण,
भारत के विविध स्वरों को करती एक नवीन।
ममता की मधुर छाँव है, माँ के आँचल-सी प्यारी,
थके हुए मन को देती आश्वस्ति अति न्यारी।
कभी लोरी बन सोती, कभी प्रार्थना बन जाती,
कभी शौर्य का शंख बजाती, चेतना जगाती।
इसके शब्दों में अपनापन, स्वर में स्नेह अपार,
मन की सूनी वीणा पर छेड़ती मधुर झंकार।
‘माँ’ कहने में जो ममता, ‘अपना’ कहने में मान,
हिंदी के प्रत्येक अक्षर में बसता हिंदुस्तान।
सरलता इसकी शक्ति, सहजता इसकी शान,
समावेशी प्रकृति ही इसका अनुपम विधान।
नवशब्दों को अपनाकर नित करती विस्तार,
समय के संग चलकर भी रखती मूल संस्कार।
विज्ञान की हो बात अथवा साहित्य का संसार,
शिक्षा, संचार, प्रशासन—हर क्षेत्र में विस्तार।
डिजिटल युग के पथ पर भी बढ़ती अविराम,
विश्व-पटल पर अंकित करती भारत का नाम।
हिंदी दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं,
यह निज भाषा के प्रति कृतज्ञता की ध्वनि।
यह स्मरण कराता हमको अपनी जड़ों का मान,
भाषा में ही सुरक्षित रहता संस्कृति का सम्मान।
पर केवल एक दिवस से हिंदी का न हो गुणगान,
नित व्यवहार में हो इसका सहज सम्मान।
अधरों पर हो हिंदी, हृदय में हो अभिमान,
कर्मों से भी जगमग हो अपनी भाषा की आन।
निज भाषा को अपनाएँ, पर न करें तिरस्कार,
अन्य भाषाओं के प्रति भी रखें सदैव सत्कार।
भाषाएँ जितनी सीखें, उतना विस्तृत ज्ञान,
पर मातृभाषा से मिलता आत्मबोध और स्वाभिमान।
हे हिंदी! तू ममता है, तू श्रद्धा, तू संस्कार,
तू जन-जन के जीवन का मधुरिम आधार।
तू शब्दों की सरिता है, तू भावों का सागर,
तू भारत की आत्मा है, तू संस्कृति का आभास अमर।
तेरी गोद में पलता है स्वप्नों का संसार,
तेरी वाणी में मिलता मन को स्नेह अपार।
तू अतीत की स्मृति, तू भविष्य का अभियान,
तू वर्तमान के मस्तक का उज्ज्वल अभिमान।
चौदह सितंबर फिर आए, संदेश यही दोहराए—
हिंदी केवल बोलें नहीं, जीवन में भी उतर आए।
जन-जन की वाणी बने, विश्व में बढ़े सम्मान,
हिंदी के गौरव से गौरवान्वित हो हिंदुस्तान।
जय हिंदी! जय मातृभाषा! जय भारत की शान,
हिंदी रहे हृदय में—युग-युग इसका मान।
शब्द-शब्द में संस्कृति हो, स्वर-स्वर में सम्मान,
हिंदी के उज्ज्वल भविष्य से उज्ज्वल हो हिंदुस्तान!
—सौरभ त्रिपाठी ‘
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