खंड खंड कर डाले भारत की भूमि सारी, समझ लिए थे वो बपौती निज बाप की।
बँटवारे की विभीषिका में जले निरदोष, सहनी पड़ी थी उन्हें आग तीनों ताप की।
बेघर किए गए थे लोग इतने कि कोई, गिनती नहीं थी न ही सीमा तौल नाप की।
कोई माँ की गोद कोई कंधे पर बाप के था, भुगत रहे थे करनी किसी के पाप की।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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