कला व विज्ञान का अनूठा समागम होता, तब जा के वास्तुकला का है रूप मिलता।
भवन बनाने तक ही न यह सीमित है, तकनीकी सभ्यता व इतिहास खिलता।
खजुराहो, सिंधु घाटी सभ्यता व तंजावुर, में भी हैं प्रमाण देख मन नहीं हिलता।
मानव की कल्पना व उपयोगिता इसी से, जीवन का वस्त्र भी इसी में सारा सिलता।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X