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उल्लू

                
                                                         
                            एक उल्लू था मुझे बैठा दिखा इक डाल पर।
                                                                 
                            
तरस मुझको आ गया उस समय उसके हाल पर।
था समय दिन का वहाँ पर दृष्टि उसकी क्षीण थी।
देखने उसको वहाँ नर नारियों की भीड़ थी।
बच्चियाँ बच्चे खड़े थे हाथ में ढेले लिए।
देखते थे गौर से, पर थे मगन चर्चा किए।
कैद करते थे उसे कुछ लोग अपने कैमरों में।
लग रहा था वे लगाएँगे उसे अपने घरों में।
नारियाँ इस काम में बढ़ चढ़ के हिस्सा ले रही थी।
कुछ तो सेल्फी में मगन स्माइल अपनी दे रही थी।
एक उल्लू साख पर था और उस पर ये दशा।
गर कहीं हर शाख होते फिर तो होती दुर्दशा।
नारियाँ जिस ओर थीं उस ओर मुँह को किए था।
दीखता तो था नहीं संतोष मन में लिए था।
वो बेचारा जाति का उल्लू डरा सहमा हुआ।
लिंग से था पुरुष तो उसने मेरे मन को छुआ।
मैं लगा फिर सोचने उसके विषय में भाव से।
ये सवारी लक्ष्मी की बैठती हैं चाव से।
लक्ष्मी घर पर मेरे भी फिर मुझे ये ध्यान आया।
वो सवारी है मेरी जिसने मुझे उल्लू बनाया।
ये मेरी अपनी नहीं सारे जगत की बात है।
स्त्री गृह लक्ष्मी, उल्लू पुरुष की जात है।
भार लक्ष्मी का लिए उल्लू बना रहता है वो।
उफ नहीं करता कभी, तूफान सह करके भी जो।
वर्ष में है एक दिन इन उल्लुओं के मान का।
लक्ष्मियाँ व्रत धारती हैं त्यागकर जलपान का।
वाहनों को पूजकर करती सवारी सर्वदा।
'रत्नेश' पूरे वर्ष फिर उल्लू बना रहता सदा।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 महीने पहले

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