साधुता जागती दीनता देखिकै तानता भौंह को पाय उद्दंडता।
ढीठ जो है वही ठानता रार को मानता नैंकु ना धारि पाखंडता।
लाख हो आसुरी वृत्ति वो भागती भोगती है सदा पाइकै दंडता।
चारुता साधना माँगती है वहाँ पै कबौ धारती है नहीं खंडता।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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