सोचत सोचत साँझ भई पर सोच नहीं मन में बन पाई।
स्वारथ में दुनिया उलझी परमारथ तो नहिं देत दिखाई।
लालच भाव भरा मन में पर मान गुमान नहीं सुधि आई।
जाय रही दुनिया किस ओर पता नहिं कौन रसातल जाई।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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