फूल बगीचन बीच खिले यह बात हमैं बतलाय रहे।
रंग बिरंग छटा छिटकी सब देखि मनै मुसुकाय रहे।
कंटक माहिं निखार हुआ तबहीं सबके मन भाय रहे।
संकट की गति कंटक सी जिमि जीवन फूल सुहाय रहे।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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