चिराग कैसे अपनी मजबुरिया बया करे,
हवाए जरुरी भी है और डर भी उसी से है
हमसफर चिराग़ भी
हमसफर हवाए भी
चश्मदीद गवाह तो लौ थी
चिरागों को हवाओं से क्या डर,
जली भी तो रौशनी कुछ देर सही,
और बुझ भी गई तो हवाओं को क्या दोष।
चोली दामन का साथ वो
आंख मिचौली की आह वो
एक अंधेरा तकटकी बांधे
टुकुर टुकुर,
लौ की रवानी से
गुफ्तगू मगर
वो इतराती लौ मगर
बलखाती हवाओं से
इधर उधर,
जीने लगी हर रात मगर
चिराग़ तो समझता है कि
कोई तूफ़ान आया था मौत बनकर,
तब भी कोई हवा उससे लिपटी हुई थी
मौत भी खेलती अगर
टकरा जाती तीली मगर
एक कतरा तिनका मगर
चिराग़ की परचम अगर
काली सी थर्राती थी
लौ को ही सींचती थी
हवाओ को दे चकमा,
वो भी पिघल उठती थी
चिराग़ तू हवाओं से मत दर
एक दिन स्वाहा होने से मत डर
जब तक जी अंधेरे को चीर दे
एक जुगनू बन के मात दे ।
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