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क़दर पाई न जीते-जी किसी ने 'लाला' हुनर की मेरे

                
                                                         
                            मैं अपनी ही ख़ामोशी में कहीं गु़म हो गया हूँ मैं,
                                                                 
                            
सफ़र ऐसा मिला मुझको कि तन्हा हो गया हूँ मैं।

ज़रूरत तक ही रक्खा सबने रिश्ता इस ज़माने में,
ग़रज़ पूरी हुई जिस दिन, पराया हो गया हूँ मैं।

चिराग़ों की तरह रौशन किया था जिनकी राहों को,
उन्हीं की बे-रुख़ी से अब अँधेरा हो गया हूँ मैं।

जो अरमाँ दिल में सुलगते थे, वही अश्कों में ढल बैठे,
तसल्ली ढूंढते-ढूंढते ही रुस्वा हो गया हूँ मैं।

रहा महरूम जो अरसे से अपनी ही तमन्ना से,
किताब-ए-ज़िंदगी का आख़िरी सफ़ा हो गया हूँ मैं।

क़दर पाई न जीते-जी किसी ने 'लाला' हुनर की मेरे,
फ़क़त अब शे'र की सूरत में ज़िंदा हो गया हूँ मैं।
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41 मिनट पहले

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