आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

घर के चिराग

                
                                                         
                            चिराग़ों को जलाओ घर में, के घर पर ही चिराग हैं
                                                                 
                            
रोशन बनाओ घर को, के घर पर ही चिराग हैं

भाग रहे हो हर वक़्त, जाने किस बात की तलाश है
दिवाली बनाओ घर में, के घर पर ही चिराग हैं

एक शाम उनके नाम जिन्हे अपना कहा था कभी
दो पल उनके लिए भी जिनकी आँखों में आपके साथ से जल उठते चिराग हैं

माँ की आंखें आज भी इंतज़ार करती हैं दरवाज़े पर
कभी बैठो उनके साथ भी, आप अब भी उनके लाल, उनके चिराग हैं

रोज़ घर तो जाता था पर शायद पहुँच नहीं पता था
आज आया हूँ तो कितनी रोशन हैं ज़िन्दगी, हर तरफ जल उठे चिराग हैं


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर