ख़ैर, अब क़ुर्बत और वस्ल का क्या ही करूँ,
जब तेरे साथ रहकर भी रातें हिज़्र में बीतती हैं।
तू मेरे सामने होता है,
फिर भी जाने क्यों
दिल तुझसे मिलने को तरसता रहता है।
तेरी बातें सुनता हूँ,
तेरी आँखों में देखता हूँ,
फिर भी भीतर कोई ख़ाली जगह
तेरा नाम लेकर चुप नहीं होती।
हम साथ होते हैं,
मगर मेरे हिस्से में
तेरी मौजूदगी से ज़्यादा
तेरी कमी आती है।
कितना अजीब है न—
जिसे खोने का डर सबसे ज़्यादा हो,
कभी-कभी वही
पास होकर भी खोया हुआ लगता है।
अब किससे कहूँ
कि तेरा साथ भी मुझे सुकून नहीं देता,
क्योंकि मेरे भीतर
तुझे खो देने का डर
हर खुशी से बड़ा हो गया है।
ख़ैर, अब क़ुर्बत और वस्ल का क्या ही करूँ—
जब तू पास होकर भी
मेरी रातों में नहीं,
मेरी तन्हाई में रहता है।
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