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तो मैं हूँ भी और नहीं भी, इसमें अंतर नहीं।

                
                                                         
                            मैं जिस छोर पर खड़ा हूँ, वहाँ कुछ नहीं,
                                                                 
                            
जहाँ कुछ था, वहाँ भी शून्यता के सिवा कुछ नहीं।

हर हलचल, हर गति, बस एक लहर है,
जिसकी कोई मंज़िल नहीं, कोई ठहराव नहीं।

यदि अस्तित्व केवल विचारों का विस्तार है,
तो मैं हूँ भी और नहीं भी, इसमें अंतर नहीं।

जिसे मैं देखता हूँ, वह मैं नहीं,
जिसे मैं खोजता हूँ, वह यहाँ नहीं।

हर सवाल जो मुझसे जुड़ा था कभी,
अब वो भी मेरा रहस्यमय 'वहाँ' नहीं।

मंज़िलें सिर्फ़ भ्रम की आकृतियाँ हैं,
सफ़र में ही शायद मेरा जहाँ नहीं।

जिसे 'मैं' कहता था, वह एक छवि थी,
जिसे छोड़ा, वही मेरा सत्य था।

हर सोच ने परिभाषित किया,
पर हर परिभाषा अस्थिर थी।

यदि मैं हूँ, तो क्यों खोज में हूँ?
और यदि नहीं हूँ, तो यह प्रश्न भी व्यर्थ था।

संभवतः शून्य ही अंतिम उत्तर है,
जिसे कोई पकड़ नहीं सकता।
-हेमंत रजक
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
45 मिनट पहले

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