आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरा साया है कि

                
                                                         
                            मेरा साया है कि रोशनी से ड़रता है।
                                                                 
                            
तभी तो मुझको वो दर्मियाँ में रखता है।।
उनकी मैं और वो मेरी भला क्यों जानें।
यही होगा मलाल अगर दिल को कसता है।।
जिंदगी है कि सजा जिन्दगी के साथ मिली।
टूटती शाखों पे घर बसाना पड़ता है।।
यूँ भी किस्मत ए कायनात बियाबाँ ही है।
जो कि आखिर में हरहाल तन्हा बचता है।।
नाउम्मीद हूँ ही नहीं कहीं किसी सूरत।
नाउम्मीदों का कहीं वक्त कभी कटता है।।
वस्ले उम्मीद में चल चल थक कि चूर हुआ।
वहाँ वो वादा मुकर वक्तो मकाँ बदलता है।।
शोखियाँ उनकी याद आके गुदगुदाती हैं।
‘‘हेम’’ यूँ ही तो ना रातें स्याह करता है।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर