मेरा साया है कि रोशनी से ड़रता है।
तभी तो मुझको वो दर्मियाँ में रखता है।।
उनकी मैं और वो मेरी भला क्यों जानें।
यही होगा मलाल अगर दिल को कसता है।।
जिंदगी है कि सजा जिन्दगी के साथ मिली।
टूटती शाखों पे घर बसाना पड़ता है।।
यूँ भी किस्मत ए कायनात बियाबाँ ही है।
जो कि आखिर में हरहाल तन्हा बचता है।।
नाउम्मीद हूँ ही नहीं कहीं किसी सूरत।
नाउम्मीदों का कहीं वक्त कभी कटता है।।
वस्ले उम्मीद में चल चल थक कि चूर हुआ।
वहाँ वो वादा मुकर वक्तो मकाँ बदलता है।।
शोखियाँ उनकी याद आके गुदगुदाती हैं।
‘‘हेम’’ यूँ ही तो ना रातें स्याह करता है।।
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