पुरुष प्रधान देश में आखिर पुरुष कितना मजबूर है?
मैं उसका दर्द अपनी रचनाओं में व्यक्त करती हूँ।
पुरुष को कोई नहीं समझ सकता,
जब तक वह एक बालक के रूप में जन्म लेता है।
उसके जन्म पर सभी लाड-प्यार करते हैं,
धूमधाम से उसके आने का जश्न मनाते हैं।
जब वह थोड़ा बड़ा होता है,
तो उसकी पढ़ाई, खाना-पीना, स्कूल जाना—
हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखा जाता है।
वह सबकी आँखों का तारा होता है,
एक पल के लिए भी नज़रों से दूर नहीं जाने दिया जाता
और उससे बड़ी-बड़ी उम्मीदें जोड़ ली जाती हैं।
लेकिन जब वही बेटा बड़ा होता है,
तो धीरे-धीरे उसकी जिम्मेदारियाँ भी बढ़ने लगती हैं।
घर की चिंता, नौकरी की तलाश,
फिर शादी और परिवार की जिम्मेदारी—
मानो उसके जीवन का हर कदम
एक नई जिम्मेदारी लेकर आता है।
और कभी ऐसा भी होता है कि
बेटा बड़ा तो हो जाता है,
लेकिन उसके पास कमाने का साधन नहीं होता,
न नौकरी होती है, न कोई स्थायी सहारा।
थक-हारकर जब वह घर लौटता है,
तो कभी उसे अपनों के ताने सुनने पड़ते हैं।
कोई उसकी स्थिति को समझने की कोशिश नहीं करता।
समय पर खाना देना तो दूर,
उसे बार-बार यह एहसास कराया जाता है—
“तू अब किसी काम का नहीं।”
जिस बेटे को कभी सबकी आँखों का तारा कहा जाता था,
वही धीरे-धीरे घर पर बोझ समझा जाने लगता है।
जिससे सबसे ज्यादा दर्द समझने की उम्मीद होती है—
वह माँ हो या पत्नी,
कभी-कभी वे भी उसकी मजबूरी को समझ नहीं पातीं।
उन्हें उसकी कमाई दिखाई देती है,
लेकिन उसके भीतर चल रही लड़ाई नहीं।
और अगर वह अपने दर्द को कम करने के लिए
किसी दोस्त से अपनी परेशानी साझा कर ले,
तो उसके चरित्र और सम्मान पर सवाल उठने लगते हैं।
आखिर वह अपना दर्द किससे कहे?
कौन सुनेगा उसे?
यही सोचकर वह मौन हो जाता है।
न किसी से कुछ कह पाता है,
न अपनी बात खुलकर रख पाता है।
वह भीतर ही भीतर घुटता रहता है,
मुस्कुराकर अपने दर्द को छिपाता रहता है।
फिर भी घर से उसकी एक ही उम्मीद होती है—
काश, कोई तो मुझे समझे...
हम पुरुष हैं तो क्या हुआ,
हमें भी दर्द होता है।
हमें भी थकान होती है।
हमें भी किसी के सहारे की जरूरत होती है।
हम भी चाहते हैं कि कोई हमें बिना सवाल किए सुन ले।
क्योंकि पुरुष होना
दर्द से मुक्त होना नहीं है।
कभी-कभी सबसे ज्यादा चुप रहने वाला इंसान ही
अंदर से सबसे ज्यादा टूट रहा होता है।
— डॉ. हेमप्रिया
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