राही रुक जा साँस ले,
आगे दलदल मैदान है,
प्रेम डगर पर चले हुए,
अब गुज़रे नौ सौ साल है।
एक सख्त शिला, आधार ध्यान,
सुन जड़े उगी आयी तन में,
है फूट पड़ी अब नसें सभी,
सुन, फूल खिल रहे हर कण में।
ये एक सदी जो बीत गयी,
आनंद इश्क़ का जीने में,
कर्ज़ उसी का चुकता करते,
अगले दो सौ साल है।
राही रुक जा साँस ले,
आगे दलदल मैदान है।
अब राम मग्न, नश्वर शरीर,
मिट्टी में रेत समान मिला,
तेज, रूप, कुछ ना होने का,
राही अनपढ़ ज्ञान मिला,
फिर चार सदी नभ पर काटी,
जो इस धरती का प्राण है,
इश्क़ प्रेम और प्रेम इश्क़ के,
गुंजन का आयाम है।
राही अब रुक जा साँस ले,
आगे दलदल मैदान है।
फिर एक सदी अभिमान किया,
इस सूक्ष्म ज्ञान के अर्जन पर,
लक्ष्य प्रेम, बहरा हो बैठा,
गूढ़ इश्क के गर्जन पर।
कुछ एक दशक ही है बीते,
रण, शून्य, साध कर जीने में,
जो शूल दंश तन पर उभरे,
अब भेष नगर की ढाल है।
आ राही रुक जा साँस ले,
आगे दलदल मैदान है।
दो शाख सदी मैंने खोई,
जाने कितना सब तार किया,
इस दक्ष धार सी बुद्धि से,
जब प्रेम रब्त पर वार किया।
सुन मेरे तो हर एक जन्म का,
अब आया परिणाम है,
बस एक उसी की आँखों में,
सारी दुनिया का ज्ञान है।
राही तू रुक जा साँस ले,
आगे दलदल मैदान है।
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