मेरा दिल गुमनाम सा हैं।
शायद तालिबान की आवाम सा हैं।।
इसे कोई रास्ता दिखता नहीं,
ये बिन मंजिल मुकाम सा हैं।।
यहां कोई बस्ता नहीं,
दिल का कोई रास्ता नहीं।
कोई कैसा भी हो इस महफ़िल में,
इसे किसी से वास्ता नहीं।।
मेरा दिल गुमनाम सा हैं।
शायद तालिबान की आवाम सा हैं।।
इसे कोई रास्ता दिखता नहीं,
ये बिन मंजिल मुकाम सा हैं।।
जब दिल को किसी से प्यार था,
तब दिल में अच्छा विचार था।
अपनी मंजिल से बेहद दुलार था,
बस कुछ ऐसा दिल का व्यवहार था।।
पर न जानें क्यों ऐसा हुआ दिल के साथ,
दिल भूल गया सबको जो अपने थे।
अब कभी याद नहीं करता उस शख्स को,
जो कभी आए मेरे सपनों में थे।।
अब दिल इतना मसरूफ़ हैं, अपनी मंज़िल में।
क्योंकि कोई अपना नहीं है, अब महफ़िल में।।
मेरा दिल गुमनाम सा हैं।
शायद तालिबान की आवाम सा हैं।।
इसे कोई रास्ता दिखता नहीं,
ये बिन मंजिल मुकाम सा है।।
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