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तरकश में कुछ तीर पड़े हैं

                
                                                         
                            खूब लड़े हैं
                                                                 
                            
खूब बढ़े हैं
हर मोर्चे पर
नाके बंदी
अपने दम पर
आज खड़े हैं
कौन कहता है
गिर पड़े हैं?
तरकश में कुछ
तीर पड़े हैं।
तमस न घेरेगा
अब हमको
नए उजास की
आशा में
फिर लड़ेंगे
हम सब डट कर
लहू लुहान ना
होंगे रण में
पहन लिए हैं
कवच औ कुंडल
अंगद पांव जमा
धरती पर
अपने जिद पर
आज अड़े हैं
तरकश में कुछ
तीर पड़े हैं।
पतझड़ को
रोकेंगे हम सब
कंकड को टोकेंगे
हम सब
सर्द हवाओं की
ठिठुरन में
नाचेंगे उतुंग
शिखर से
हारेगा प्रतिकूल
प्रभंजन
सोम रस के
लिए घड़े हैं
तरकश में कुछ
तीर पड़े हैं ।
अंगारे उगलेगा
दिनकर
पराबैगनी किरणें
होगी
कदम बढ़ेंगे
सोच समझकर
यहीं सुभाष
थे यहीं पर
गांधी
रोक लिए
तूफान की
आंधी
ऐसे- ऐसे
वीर बड़े हैं
तरकश में
कुछ तीर पड़े हैं।
-हंस नाथ यादव
 
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41 मिनट पहले

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