कहीं विश्वास गिरा पड़ा था,
तो कहीं सब्र टूटकर बिखरा था।
कहीं सम्मान छिपने की जगह ढूंढ रहा था,
तो कहीं एक कोने में प्रेम जख्मी पड़ा था,
कहीं इच्छाएं बेसुध पड़ी थी,
तो कहीं उम्मीद होश खोए बैठी थी,
कहीं सपने खुदकुशी करने की कोशिश में थे,
तो कहीं एक कोने में जज्बात सहमे से बैठे थे,
सब कुछ समझ से परे था,
वो रंगहीन रक्त का समंदर आंखों में भरे था।
और जब टूट कर पूरी तरह बिखर गए,
तो फिर वो खुद की तलाश में निकल गए,
समेट रहे थे खुद को खुद ही खुद के अंदर
और इस तरह धीरे-धीरे थे निखर रहे।
वापस लौट चला वो बचपन की गलियों में,
फिर मिलने खुद से ही उन बस्तियों में,
जहां से ढूंढ कर वो सुकून लाया
खुद में भरकर एक नया जुनून आया,
अब अकेला ही काफी वो दिल का सच्चा बन गया,
सब समझ चुका था जो वो अब बच्चा बन गया।
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