ज़िंदगी दिखला रही है, ढेर सारे रास्ते।
मैं चुनूँ इनमें से किसको, चल सकूँ आराम से।
ख़त्म होते दिख रहे हैं, मार्ग सारे सून्य पर।
सून्य ही ग़र सत्य है, फिर क्यूँ चलें इस राह पर!
गुमनुमे इस रास्ते में, फ़िक्र है एकी मगर।
गुम ना हो जाऊँ कहीं मैं, रास्तों में इधर-उधर।
ग़ौरतलब है-ग़ौरी समझो, मिथ्या टाल ना पाओग़े।
सच जो होना है कल-परसों, आज समझ ना पाओगे।
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