कैसी उजली ये बस्ती है जिसमे सब के सब काले हैं,,
ओ रातों के परछाई को कह देते देख उजाले हैं,,
ये कौनफिरे हैं दर दर दर मुफ्लिस कोई कोई बे घर,
बढ़ता ये निरंतर देस मेरा छपते हर रोज रिसाले हैं,,
ऐसे भी यहाँ बहु लोग पड़े जिनका आता इतवार नही ,
मखमल वाले ये क्या जाने कितने पाँवो मे छाले हैं,,
मजदूर भटकते रोटी को रोटी के खेल निराले हैं,,
कुछ लोग अभीँ भी ढूंढ़ रहे कुछ लोग तो ढूढ़ निकाले हैं,,
रोटी वाले खामोश हैं क्यों वो अपनी जबाँ से कुछ बोलें,
हम पूंछ रहे हैं रोटी से रोटी कि जबाँ पे ताले हैं,,
-एजाज़ अहमद
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