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समाज, संघर्ष, संबंध और युद्ध

                
                                                         
                            हम सभी
                                                                 
                            
एक अघोषित युद्ध के संघर्ष में,
जन्में, पले-बढ़े योद्धा हैं।

हर किसी की
युद्ध नीति,
युद्ध रीति भिन्न है,
युद्ध के हथियार भी भिन्न है,
और बहुत हद तक यह सत्य है कि
युद्ध के उद्देश्य भी
अपने अपने दायरे में सिमटे हुए हैं
लेकिन भिन्न है।

इन तमाम अलगाववादी,
भिन्न विचारों के बीच,
एक ही चीज हम सभी में समानधर्मा है,
कि हम सभी,
अपने आखिरी समय तक,
अपनी आखिरी सांस तक
रक्त के प्रवाह शिथिल होने से पहले तक
लड़ते रहना चाहते हैं और लड़ते रहेंगे।

जूझते रहेंगे, संबंधों के माया जाल में,
उलझते रहेंगे, सुलझाते रहेंगे,
तमाम समझौतों का बीड़ा उठाते रहेंगे, निभाते रहेंगे।

इस अघोषित युद्ध में
जय पराजय मायने नहीं रखता,
कुछ भी करके जुटना और पाकर खो देना भी
मायने नहीं रखता,
यह तो निरंतर दग्ध, भीषण शैली का युद्ध है,
जहां सब कुछ खो कर भी,
योद्धा को लड़ना है।
और बहुत कुछ पाकर भी निरंतर,
लड़ते ही रहना है।

अपने-अपने उद्देश्यों के बीच,
उद्देश्य विहीन, युद्धरत समाज, संघर्ष,
संबंधों के जाल में,
सत उद्देश्य के झंडे,
रोटी के नारे,
बस भीड़ और अपने अपने विवेक कौशल के एजेंडे है।

समाज, संघर्ष और संबंध के इस अघोषित युद्ध में,
'हम' शब्द ही बार बार,
सबसे बड़ी ठगी बन जाता है।
और हर बार रोटी सबसे जटिल प्रश्न।

-अंकिता चौधरी
 
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2 वर्ष पहले

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