“मेरा घर”
बस इतनी सी दिल में चाह,
एक छोटा सा हो घर मेरा,
जहाँ हर दीवार जुबां बने,
और हर कोना अपना कहे।
जो विरासत में न पाया हो,
अपने दम पर मैंने सजाया हो।
न हो सिर्फ ईंट और पत्थर,
यादों का हो सुंदर मंज़र।
खिड़की से धूप ये बतलाए,
“उठ, आज नया दिन मुस्कुरा ले।”
शाम की ठंडी हवा फुसफुसाए,
“अब थकन मिटा, चैन से जी ले।”
एक छोटा आँगन हँसी सजे,
किलकारी से जीवन महके।
दरवाज़ा खोलूँ जब आके,
सुकून गले मुझको लगाए।
अपने सपनों का यह जहाँ हो,
जिसे प्यार से अपना कह सकूँ।
कल को जब सफर ये थमे मेरा,
परिवार को दे जाऊँ आशियाना तेरा।
-शिव राय पुरी
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