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मैं अकेली खड़ी रही उस जंग में

                
                                                         
                            हलक में अटका रहा वो निवाला,
                                                                 
                            
और आंखों में ठहर गया वो खून का पानी,
अस्पताल के ठंडे गलियारों में घूमती रही
मेरे बिखरते वजूद की एक अनकही कहानी।

मेरी फूलती सांसें, व्हीलचेयर का वो बोझ,
माता-पिता की बेबसी का वो मूक हाहाकार,
गाड़ी में घने अंधेरे को ताकते वे घंटों के इंतज़ार,
कोई नहीं आया बांटने वो खामोश चीत्कार।

शीशे में देखा जब खुद को, तो एक अजनबी खड़ी थी,
दो महीनों में सिर्फ वज़न नहीं घटा,
मेरी रूह का हर एक कोना कड़वाहट से भर गया,
जब भाई की उठती अर्थी के साथ मेरा दिल मर गया।

लोग आए, अफ़सोस के चंद लफ्ज़ उछाले और चले गए,
फिर छा गया एक अंतहीन, डरावना सन्नाटा,
जिसने चाहा, उसने भी मुंह फेर लिया अपने संघर्षों का बहाना देकर,
तब मैंने भी सीख लिया... अपने जख्मों को अकेले ही सहकर।

हाँ, अब दिल में कोई मोहब्बत नहीं जगती,
अब मन सिर्फ जहर उगलता है और पूछता है सवाल—
जब मैं चूर-चूर हुई, तब तुम कहाँ थे?
अब तुम भी अपने संघर्षों में तसल्ली ढूँढो, यही है तुम्हारा हाल!

मुझे माफ करो, अब मेरे पास देने को कुछ नहीं,
अपने जीवन से मेरे वजूद को मिटा दो तुम,
जो सब्र का पाठ तुमने मुझे तब पढ़ाना चाहा था,
आज उसी सब्र के घूंट को खुद पीकर दिखाओ तुम।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
42 मिनट पहले

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