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अन्तरात्मा की गुहार

                
                                                         
                            सत्य के पथ पर अहर्निश, कर्म का संकल्प प्रज्ज्वलित रहा,
                                                                 
                            
पर असत्य के स्पर्श मात्र से, चित्त यह उद्विग्न हो व्यथित हुआ।
जब-जब निष्ठा के निष्कलंक भाव पर संशय की छाया ढली,
अश्रु बनकर नयनों से, अंतर का मर्मान्तक संताप बहा।

मापदंडों में छल के, मत तौलो इस निर्मल सत्य की पावनता को,
ये नयन-नीर न प्रपंच कोई, यह तो क्षत-विक्षत आत्मा का क्रन्दन है।
श्रम-स्वेद बहाने में असमर्थ नहीं यह निष्ठावान काया,
पर बेयकीनी का दंश सहना, स्वाभिमान का मरण-क्रन्दन है।

जब भी आता नव-दायित्व कोई, संशय का घनघोर तिमिर छा जाता है,
विश्वासहीन दृष्टियों का दंश, नव संकल्पों को डस जाता है।
जहाँ निष्ठा के निष्पाप समर्पण पर अविश्वास की कील गड़े,
वहाँ कर्म-पथ का हर अभिलाषी अंकुर, निष्प्राण होकर मुरझा जाता है।

अब न थमाओ कोई नव-भार, न उलझाओ विषम विडंबनाओं में,
जहाँ आत्मा की बलि देकर, केवल अंधी आज्ञा का विधान रहे।
सह लेगी यह सहनशीलता, ताड़ना और उपलांभ सहर्ष,
पर जहाँ चरित्र पर प्रश्न उठे, न ऐसे कर्म का कोई स्थान रहे।
यह अंतिम मूक गुहार यही, इस आहत निष्ठावंती की,
जहाँ विश्वास का संबल न हो, वहाँ दायित्वों का भार न दिया जाए।
छीन लो भले ही सकल अधिकार, पद और प्रतिष्ठा के अवसर,
पर आत्म-सम्मान की चिता जलाकर, कोई कार्य न लिया जाए।
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5 घंटे पहले

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