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सामयिक ग़ज़ल

                
                                                         
                            क्या तबाही ये कर गया पानी
                                                                 
                            
पूरी बस्ती में भर गया पानी

पुल सड़क घर दुकान क़स्बा तक
नेस्त-नाबूद कर गया पानी

मौत का ख़ौफ़नाक मंज़र था
जिस तरफ़ से गुज़र गया पानी

कितने परिवार बाल बच्चों की
ज़िंदगी लील कर गया पानी

उनसे उम्मीद क्या करे कोई
जिनकी आँखों का मर गया पानी

बाँध नदियों पे वे बनाते रहे
सर के ऊपर उतर गया पानी

कितनी आँखों में हादसा बनकर
उम्र भर को ठहर गया पानी
- मनोज अबोध
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3 घंटे पहले

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