ठहर जाती हैं आँखें तेरी सुंदर कुदरत की रचना को देखकर,हे प्रभु तू कितना गूढ़ शिल्पकार है,
कहने को दुनिया में इंसानों के बनाए बहुत अचंभे हैं, पर तेरी रचना के आगे बौने सारे शिल्पकार हैं।
कितनी सुंदर तुमने धरती पर हर एक चीज़ बनाई है,कैसे तुमने इतनी विविध रंगों की प्रकृति सजाई है,
कहीं पर्वत कहीं पहाड़ कहीं नदी बनाई है कहीं मरुस्थल कहीं सागर तो कहीं धरती लह लहराई है।
अद्भुत अकल्पनीय अति सुंदर तुम्हारी ये कलात्मकता, बरबस ही इन आँखों में चमक बन उतर आयी है,
कितने प्यार से सींचा है तुमने ये ब्रह्मांड एक एक चीज़ बनाने में तुमने अवर्णनीय मनमोहक कुशलता दिखाई है।
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