ना शिक्षा की ज्योति जगी,ना ज्ञान का कोई मान हैं
जातिवाद का दम्भ भरकर,हम कहते देश महान' हैं
जाति वर्ण के नशे में हम,इतने मदहोश हो गए
काल्पनिक किस्से सच लगे,और सच से कोसों दूर हो गए
कहते खुद को हम विश्व गुरु,पर विज्ञान से नाता तोड़ दिया
हर आधुनिक आविष्कार को,झूठे किस्सों से जोड़ा से दिया
काम विदेशी वस्तुएं आई फिर भी मिथ्य अभिमान हैं
जातिवाद का दम्भ भरकर,हम कहते देश महान हैं
मंदिर, सड़कें,भवन इमारतें,जिन हाथों ने बनाये हैं
जिन्होंने भारत को सींचा,वही आज पराये हैं
मूर्तियां गढ़ीं पत्थर पर जिसने,उसे अछूत बना दिया
उसी मंदिर की सीढ़ियों पर,हमनें उसका लहू बहा दिया
इंसान को जो नीच कहे,वो खुद नीच सामान हैं
मानव को जिसने नीच बनाया,वह देव नहीं हैवान हैं
जब-जब हमलावर बाहर से आयें,बारूद की हम पर मार पड़ी
कहाँ गई तब मंत्रों की शक्ति,और शस्त्र-अश्त्र की वो धाक बड़ी
जातिवाद की दीवारों ने,था हमको गुलाम बनाया
आज फिर उसी पाखंड ने,फ़िर हम पर घेरा हैं फैलाया
छुआछूत की आग में जलता,अपना हिंदुस्तान हैं
जाति का हम दम्भ भरकर,कहते देश महान हैं
दुनिया में जो मान मिला,वो मिला बुद्ध की करुणा से
अशोक के साहस से और गांधी की अहिंसक प्रेरणा से
छोड़ो अब अंधविश्वास की बातें,तर्क की राह पर चलना होगा
जापान और चीन की तरह,अब ख़ुद को हमें बदलना होगा
तभी बनेगें विश्व गुरु,जब जागेगा हर इंसान
दुनियाँ फिर कहेगी गर्व से,यह भारत देश महान
ना शिक्षा की ज्योति जगी, ना ज्ञान का कोई मान हैं
जातिवाद का दम्भ भरकर हम कहते 'देश महान' हैं
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