मुकद्दर को अपने कुछ ऐसे मोड़ देंगे
बिछा कर ज़मीं आसमां ओढ़ लेंगे
उम्मीद हर सांस में अब भी है बाक़ी
मुमकिन नहीं हम जीना छोड़ देंगे
- फ़ौज़िया नसीम शाद
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