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                            1947 में जन्मी
                                                                 
                            
वो अब काफी बड़ी हो चुकी है
गांव से निकल कर शहर आ चुकी है
अब लाज नहीं आती है बतियाने में
कुछ भी बक देती है सठियाने में
कौन किस पद पर कहाँ नियुक्त है
शब्दों में सम्मान भाव अप्रयुक्त है
सब कुछ वह बोल जाती है
संसद में भी वो डोल जाती है
प्रतिष्ठा खो चुकी है अपनी वो
नंगी हो चुकी है पूरी अब वो
जैसे जैसे उम्र बढ़ती है
जुबान कैंची सी चलती है
संबोधन बदल गये हैं
उद्बोधन दुश्मन हो गये हैं
आजादी नाम की लड़की
अब और बहुत बिगड़ी
स्वच्छन्द हो गयी है
अपशब्दों से भरी अनाचारी बिगड़ेल
और नियमहीन हो गई है.
सम्हालना होगा इसे
वर्ना आवारा हो बहक जायेगी
दूसरों के पास चली जायेगी.

- दिनेश चौहान
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4 घंटे पहले

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