जिन्दगी जीने के लिए कुछ मुखौटे चाहिए
सुबह से शाम तक किरदार अलग चाहिए.
मन्दिरों में माथ टेके मस्जिदों में नमाज़ हो
रात क्लब में जा कोई हुस्न मिलना चाहिए.
बस्तियों में बैठ कर दुःख दर्द की बातेँ करें
मजबूरियां यदि मिलें उनको भुनाना चाहिए.
जब अंधेरी रात हो लूट कर घर खुद भरो
फिर उजाले में पहुँच थोड़ा लुटाना चाहिए.
चाकरी अजगर सरीखी बैठ कर के कीजिये
हो सियासती आड़ तो व्यापार करना चाहिए.
-दिनेश चौहान
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