आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जीवन मरण योग.

                
                                                         
                            तबाही का मंजर
                                                                 
                            
बारिश का खंजर
गरीब के सीने पर
उतर गया फिर .

दीवार गिर गई
रोटियां दब गईं
भूख उभर आई
आंखें धंस गईं.

खपरैल की बस्ती
टूटी हर गृहस्थी
बाढ़ जम कर आई
जिंदगानी बह गई.

मरे मजदूर की
जेबें तलाशते
कुछ नहीं पाते
बहुत ही गरियाते.

चलते हुए कैमरे
तड़पते मरते लोग
उपदेश देते चलते
जीवन मरण योग.
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर