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एक को ऊँचाई पर खुद की तलाश आती है

                
                                                         
                            जगह का ख्याल बड़ा है,
                                                                 
                            
कहाँ ठहरना है,
कहाँ नहीं,
यही तो संस्कार है,

कोई राह बनाता है,
कोई राह पर नाम टांगता है,

एक को ऊँचाई से लाज आती है,
एक को ऊँचाई पर खुद की तलाश आती है,

बुजुर्गों ने कहा था झुक कर चलो,
समय कह रहा है दिख कर चलो,

पहाड़ वहीं हैं, हवा वहीं है,
रास्ते वहीं हैं, दिशा वहीं है,
बदला है तो बस चलने का सलीका,

जो झुक कर चलता है,
वो शोर नहीं करता, पर याद रहता है,
जो चढ़ कर दिखता है,
वो शोर तो करता है, पर ठहरता नहीं।
-देवकी नन्दन
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6 घंटे पहले

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