ख़ुद पर तुम इतराते क्यों हो,
हम पे सितम ये ढाते क्यों हो।
मिलने से कतराते क्यों हो,
इतना भी शरमाते क्यों हो।
कुछ न कुछ तो लोग कहेंगे,
तुम इतना घबराते क्यों हो।
तुम से मिलने की हसरत है,
हम को तुम तरसाते क्यों हो।
कोई अगर गिला शिक़वा है,
हम से कहो छिपाते क्यों हो।
वस्ल के इन दिलकश लम्हों को,
होकर ख़फ़ा गँवाते क्यों हो।
तुम्हीं मिरी मंज़िल हो "शमीम",
हम से नज़रें चुराते क्यों हो।
-देवेन्द्र सचदेवा शमीम"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X