तुम न हो गर तो ज़िंदगी क्या है,
मिले तुम तो जाना शाइरी क्या है।
रुबरु हो और नज़र नहीं मिलाते,
इल्म होता है हमें बे-रुख़ी क्या है।
तुम को पाकर ख़ुदाई पाई जैसे,
ख़ुदा को माना जाना बंदगी क्या है।
मय-कशी क्या है बेख़बर थे हम,
मिलीं नज़रें, समझे बेख़ुदी क्या है।
खिला खिला तुम्हारा ये चेहरा हसीं,
मेरे हाथों में है मुझे कमी क्या है।
तुम्हारे दिल में क्या है बयाँ कर दो,
नहीं समझे तुम्हारी ख़ामुशी क्या है।
शमीम क़ुर्ब तुम्हारा नसीब है मेरा,
इस से ज़्यादा कोई भी ख़ुशी क्या है।
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