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माज़ी की याद

                
                                                         
                            था शहर वही और वही तुम्हारी गली थी,
                                                                 
                            
लेकिन उस शहर मे बस तुम्हारी कमी थी।

हम जानते थे तुम उस राह पर न मिलोगे,
न जाने क्यूँ तुम्हीं को नज़र ढूँढ रही थी।

जब चाहते हैं दीदार कर लेते हैं तुम्हारा,
तस्वीर-ए-यार तो हमारे दिल में बसी थी।

तुम दूर रहकर भी न दूर हो सके हम से,
माज़ी की याद हर क़दम पर साथ रही थी।

मेरे साथ तुम नहीं मेरी तन्हाई रहती है,
तन्हाइयों ने मेरी हर एक बात सुनी थी।

"शमीम" ज़ुल्मत-ए-शब बारहा नहीं कटती,
मेरे साथ हर एक रात शमा भी जली थी।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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4 घंटे पहले

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