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हक़ीक़त

                
                                                         
                            हमारा मिलना और हमारा राब्ता होना,
                                                                 
                            
ज़हे-नसीब से मुमकिन हुआ ऐसा होना।

तुम्हारा मालो-ज़र जो है यहीं रह जाएगा,
ख़ुद के बारे में फिर क्या मुग़ालता होना।

मैं एक इन्साँ बन सकूँ इतना काफी है,
बहुत दुश्वार होता है इक फरिश्ता होना।

मोहब्बत है अगर तो दूरियाँ होते हुए भी,
नहीं मुमकिन है दिलों में फासला होना।

अयाँ होती नहीं हक़ीक़त कभी चेहरे से,
नहीं आसान है नीयत का नुमाया होना।

सिर्फ चाहत से सब नहीं हासिल होता,
ज़रूरी है "शमीम" नसीब भी उम्दा होना।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 दिन पहले

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