सहमा सहमा हुआ सारा ये शहर लगता है,
अब तो इंसान को इंसान से डर लगता है।
शक़ की नज़र से देखते हैं सभी औरों को,
नहीं अपना यहाँ पर कोई मोतबर लगता है।
कोई तूफ़ान सा आया हो जैसे ये लगता है,
यहाँ माहौल हुआ ज़ेर-ओ-ज़बर लगता है।
गले मिलते थे जो आपस में; बन गए दुश्मन,
किसी की बोयी नफ़रतों का असर लगता है।
आग जलती है जहाँ और धुआँ धुआँ सा है,
वहाँ किसी का तो जल रहा है घर लगता है।
"शमीम" आज तक तारीख़ से सबक नहीं लिया,
जो भी हासिल हुआ नफ़रत से सिफ़र लगता है।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
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