हर सुबह जब सूरज की पहली किरण आती है,
ओस की बूंदों पर मोती-सा नूर सजाती है,
पेड़ों के पत्ते जैसे कोई राग सुनाते हैं,
हवा के संग प्रकृति अपना आँचल लहराती है।
नदियाँ बहतीं, जैसे कोई कहानी कहतीं,
अपनी लहरों में सदियों के राज़ बहतीं,
पहाड़ खड़े हैं, मौन में भी ज्ञानी लगते,
बादलों को छूकर फिर धरती से मिलते।
खेतों में सरसों जब पीली चादर ओढ़े,
तितलियों के मन में भी सपने थोड़े-थोड़े,
कोयल की कूक में जो मीठी सादगी है,
वही तो प्रकृति की असली बंदगी है।
न इसमें कोई छल है, न कोई दिखावा,
जो है सामने, वही है सच्चा, वही है छावा,
इसी की गोद में हम सबने जन्म पाया,
इसी की सांसों ने हमको जीना सिखाया।
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