ये ज़िंदगी भी अजीब है,
भीड़ में भी तन्हा नसीब है।
सबके पास सब कुछ है यहाँ,
फिर भी हर दिल में एक कमी है यहाँ।
शाम ढले तो यादें लौट आती हैं,
बिना दस्तक के दिल में बैठ जाती हैं।
मैंने सीखा है अकेले चलना,
गिर कर खुद से ही संभलना।
कोई नहीं भी हो तो क्या गम है,
अपना साया भी तो हमदम है।
ज़िंदगी रुकी नहीं, चल रही है,
अकेली सही, पर संवर रही है।
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