नित नूतन ज्ञान दीप जलाऊं तो शिक्षक हूँ
अज्ञान तिमिर को दूर भगाऊं तो शिक्षक हूंँ
बच्चे हैं, अपनी मंजिल से अनजाने हैं
ऊंगली पकड़ू ,राह दिखाऊं तो शिक्षक हूंँ
जीवन पथ के कंकड़ ,कंटक से निर्भीक हो
खुद कांटों पर चल मुस्काऊं तो शिक्षक हूंँ
उपवन उपवन मधुर पुष्प हैं, मधुर सुगंध है
कागज के फूलों को महकाऊं तो शिक्षक हूंँ
बच्चों का , गुरु पितृ मित्र बंधु भगिनी हूंँ
माँ बनकर निज वक्ष लगाऊँ तो शिक्षक हूंँ
चरित्र, त्याग, कर्तव्य ही मेरे मूल मंत्र हों
शिक्षक की शिक्षा बन जाऊं तो शिक्षक हूंँ
नित नूतन ज्ञान दीप जलाऊं तो शिक्षक हूंँ
अज्ञान तिमिर का मूल मिटाऊं तो शिक्षक हूंँ
शिक्षक की शिक्षा बन जाऊँ तो शिक्षक हूंँ
-देवेन्द्र चौहान
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