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मैं फिर लौटूँगा…

                
                                                         
                            मैं फिर लौटूँगा…
                                                                 
                            

सूरज हूँ मैं,
कुछ देर को डूबा हूँ—
मगर ख़त्म नहीं हुआ।

वक़्त की धूल ने
चेहरे पर उदासी लिख दी तो क्या,
मेरी रूह पर आज भी
उम्मीद बाक़ी है।

माना कि आज
अँधेरों ने घेर रखा है मुझे,
माना कि कुछ रास्ते
मुझसे रूठ गए हैं…
लेकिन मैंने चलना
अब भी नहीं छोड़ा।

मैंने सीखा है—
हर गिरना हार नहीं होता,
कुछ गिरावटें तो
इंसान को उसकी असली ऊँचाई
दिखाने आती हैं।

जो मुझे आज
कमज़ोर समझ रहे हैं,
उन्हें मेरा शोर नहीं मिलेगा…
मेरा लौटना मिलेगा।

मैं जवाब दूँगा,
मगर लफ़्ज़ों से नहीं—
अपने वजूद से।

मैं फिर उठूँगा,
फिर सँवरूँगा,
फिर चमकूँगा…

क्योंकि मेरी कहानी का
अंत अँधेरे में नहीं लिखा गया।

मैं सूरज हूँ—
डूबना मेरी मजबूरी हो सकती है,
मगर लौटकर रोशनी करना
मेरी फ़ितरत है।

और याद रखना—

आज जिसने मुझे अँधेरा समझा है,
कल उसी की सुबह
मेरे उजाले से होगी।

आपका,
दीपक शर्मा ‘Deep’
@deepakdilbook | @kavijideepak
Dilbook — Kuch Ahsas Dil Ki Kalam Se
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7 घंटे पहले

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